Showing posts with label माखनलाल चतुर्वेदी. Show all posts
Showing posts with label माखनलाल चतुर्वेदी. Show all posts

दूर न रह, धुन बॅंधने दे - माखनलाल चतुर्वेदी

दूर न रह, धुन बँधने दे

मेरे अन्तर की तान,

मन के कान, अरे प्राणों के

अनुपम भोले भान।


रे कहने, सुनने, गुनने

वाले मतवाले यार

भाषा, वाक्य, विराम बिन्दु

सब कुछ तेरा व्यापार;


किन्तु प्रश्न मत बन, सुलझेगा-

क्योंकर सुलझाने से?

जीवन का कागज कोरा मत

रख, तू लिख जाने दे।


- माखनलाल चतुर्वेदी

 
Designed by Lena