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काल, तुझसे है होड मेरी: शमशेर बहादुर सिंह

काल, 
तुझसे होड़ है मेरी : अपराजित तू- 
तुझमें अपराजित मैं वास करूँ। 

इसीलि‌ए तेरे हृदय में समा रहा हूँ
सीधा तीर-सा, जो रुका हु‌आ लगता हो- 

कि जैसा ध्रुव नक्षत्र भी न लगे, 
एक एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरिभाव, भावोपरि 

सुख, आनंदोपरि 
सत्य, सत्यासत्योपरि 
मैं- तेरे भी, ओ’ ’काल’ ऊपर! 
सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल ! 

जो मैं हूँ- 

मैं कि जिसमें सब कुछ है... 

क्रांतियाँ, कम्यून, 
कम्यूनिस्ट समाज के 
नाना कला विज्ञान और दर्शन के 
जीवंत वैभव से समन्वित 
व्यक्ति मैं। 

मैं, जो वह हरेक हूँ
जो, तुझसे, ओ काल, परे है...
काल, तुझसे होड़ है मेरी। 

-शमशेर बहादुर सिंह

अभ्यंग-शमशेर बहादूर सिंग

अभ्यंग तुझ्या देहाचं
माझ्या शरीराचं

प्रत्येक सूर्योदयामध्ये
प्रत्येक सोनेरी सकाळ

तुझं अंग आहे
एका कृष्णछायेच्या
आरपार नाचणारं

झिरझिरी सूर्यद्रवामध्ये
पुन्हा पुन्हा
दर सकाळी

-शमशेर बहादूर सिंग यांच्या हिंदी कवितेचा सलील वाघ यांनी केलेला अपभ्रंश

 
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