त्रिवेणी- गुलझार

सारा दिन बैठा, मैं हाथ में लेकर खा़ली कासा (भिक्षापात्र)
रात जो गुज़री, चांद की कौड़ी डाल ग‌ई उसमें
सूदखो़र सूरज कल मुझसे ये भी ले जायेगा।
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ज़मीं भी उसकी, ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है, घर भी,ये घर के बंदे भी
खुदा से कहिये, कभी वो भी अपने घर आयें!
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लोग मेलों में भी गुम हो कर मिले हैं बारहा
दास्तानों के किसी दिलचस्प से इक मोड़ पर
यूँ हमेशा के लिये भी क्या बिछड़ता है को‌ई?
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पौ फूटी है और किरणों से काँच बजे हैं
घर जाने का वक्‍़त हु‌आ है,पाँच बजे हैं
सारी शब घड़ियाल ने चौकीदारी की है!
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तमाम सफ़हे किताबों के फड़फडा़ने लगे
हवा धकेल के दरवाजा़ आ ग‌ई घर में!
कभी हवा की तरह तुम भी आया जाया करो!!
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कभी कभी बाजा़र में यूँ भी हो जाता है
क़ीमत ठीक थी, जेब में इतने दाम नहीं थे
ऐसे ही इक बार मैं तुम को हार आया था।
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वह मेरे साथ ही था दूर तक मगर इक दिन
जो मुड़ के देखा तो वह दोस्त मेरे साथ न था
फटी हो जेब तो कुछ सिक्के खो भी जाते हैं।
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कुछ मेरे यार थे रहते थे मेरे साथ हमेशा
को‌ई साथ आया था, उन्हें ले गया,फिर नहीं लौटे
शेल्फ़ से निकली किताबों की जगह ख़ाली पड़ी है!
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बुड़ बुड़ करते लफ्‍़ज़ों को चिमटी से पकड़ो
फेंको और मसल दो पैर की ऐड़ी से ।
अफ़वाहों को खूँ पीने की आदत है।
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चाँद के माथे पर बचपन की चोट के दाग़ नज़र आते हैं
रोड़े, पत्थर और गु़ल्लों से दिन भर खेला करता था
बहुत कहा आवारा उल्का‌ओं की संगत ठीक नहीं!
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को‌ई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चुटख़े हुये हैं कब से
टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझ को!
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तुम्हारे होंठ बहुत खु़श्क खु़श्क रहते हैं
इन्हीं लबों पे कभी ताज़ा शे’र मिलते थे
ये तुमने होंठों पे अफसाने रख लिये कब से?

- गुलझार

2 comments:

विक्रम said...

Thanks a lot for arranging Gulzar's collection here.

Nice work, and appreciated your NO COPY PASTE thing as well.

Shraddha Bhowad said...

Nytime. I appreciate your appreciation. Very few ppl conaissez the stand behind it, rest end up cursing me.
Keep reading, coming up soon is Nida and Naresh Mehta.

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